3 जुलाई को मध्य प्रदेश के भिण्ड ज़िले में जन्मे माता प्रसाद शुक्ल हिंदी साहित्य की विविध विधाओं में पिछले चार दशकों से निरंतर सक्रिय हैं। उन्होंने जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर से राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की। उनकी साहित्यिक यात्रा की शुरुआत पत्रकारिता से हुई, जिसने उनके लेखन को सामाजिक सरोकारों, स्थानीय जीवन और आम जनमानस की संवेदनाओं से गहराई से जोड़ा। समय के साथ उन्होंने कविता, क्षणिका, ग़ज़ल, निबंध, लघुकथा, संस्मरण, बाल साहित्य और उपन्यास जैसी अनेक विधाओं में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई।
उनकी प्रकाशित कृतियों में सृजन, प्रतिबंध (क्षणिका संग्रह), ग्वालियर के गली बाज़ार मोहल्ले के दोनों भाग, रेखाओं के बीच (निबंध संग्रह), लाइन हाज़िर (लघुकथा संग्रह), जौरा के मंगौड़े, एस. पी. साहेब ने फीता काट दिया (संस्मरण), माधौगंज में बचपन (उपन्यास), मुफ़लिसी का पत्थर (ग़ज़ल संग्रह), काश हमारे पंख होते (बाल कविता संग्रह) तथा तुलसी का बिरवा (कविता संग्रह) विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। उनकी पुस्तक ग्वालियर के गली बाज़ार मोहल्ले के प्रथम भाग का मराठी अनुवाद भी प्रकाशित हो चुका है।
उनके साहित्य में ग्वालियर शहर की गलियों, मोहल्लों, बाज़ारों और वहाँ बसे लोगों के जीवन की सहज और जीवंत छवियाँ दिखाई देती हैं। स्थानीय संस्कृति, सामाजिक संबंधों और आम आदमी के संघर्षों को वे संवेदनशीलता और आत्मीयता के साथ प्रस्तुत करते हैं। उनका लेखन केवल स्मृतियों का दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि बदलते समाज और समय का महत्त्वपूर्ण साहित्यिक अभिलेख भी है।
उनकी रचनाओं का प्रसारण आकाशवाणी और दूरदर्शन से भी हुआ है। साहित्य के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें विभिन्न राज्यों में अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। लेखन के प्रारंभिक वर्षों में वे मध्य भारतीय हिंदी साहित्य सभा, ग्वालियर से जुड़े रहे। बाद में उनका जुड़ाव जनवादी लेखक संघ से हुआ। वे साहित्यकार कल्याण ट्रस्ट के संस्थापक हैं तथा वर्तमान में मध्य प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन की ग्वालियर इकाई के अध्यक्ष के रूप में सक्रिय हैं।
दीर्घ साहित्यिक साधना, सामाजिक प्रतिबद्धता और बहुविध रचनात्मक योगदान के कारण माता प्रसाद शुक्ल समकालीन हिंदी साहित्य में एक सम्मानित और विशिष्ट स्थान रखते हैं।